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गढ़वा। गढ़देवी मन्दिर के निकट अवस्थित प्राचीन नरगिर आश्रम मे नवरात्र के अवसर पर चल रहे रामकथा के छठे दिन कथा वाचक बालस्वामी प्रपन्नाचार्य ने राम वन गमन के कारण एवं उसके परिणामों का विशद विवेचन किया। साथ ही कई व्यवहारिक उपदेश भी दिए।
उन्होंने कहा कि जीव को कर्म फल भोगना ही पड़ता है। इससे कोई नहीं बच सकता। कोई किसी को दुख या सुख नहीं देता है बल्कि इसके लिए उसका कर्म ही जिम्मेवार होता है। सुख दुख कर्म के कारण ही उत्पन्न होते हैं। एक उम्र के बाद बाल सफेद होने लगता है। प्रकृति संकेत देने लगती है कि अब आगे आप सचेत हो जाएं। विषयों से अनासक्त होकर ईश्वर और अध्यात्म की ओर रुचि बढ़ा देना ही विवेकशील पुरुषों के लक्षण बताए गए हैं।
दशरथ जी ने दर्पण मे अपने कान के बाल को सफेद देख कर अपना राजपद अपने ज्येष्ठ पुत्र राम को देने का निश्चय किया। दर्पण कभी झूठ नहीं बोलता । वह हमेशा वास्तविकता दिखाता है। गुरु के रजकण मन रूपी दर्पण को स्वच्छ रखने मे मदद करता है।  राम मर्यादा एवं आदर्श के प्रतिमूर्ति थे। अपने पिता के वचन निभाने के लिए राज्यारोहण के बदले वनवास को भी उन्होंने सहजता से स्वीकार किया। ऐसा त्याग आज के परिप्रेक्ष्य मे संभव ही नहीं है। वन गमन रामायण का वह भावुक प्रसंग है, जिसमें श्रीराम, सीता और लक्ष्मण ने पिता दशरथ के वचन का पालन करते हुए 14 वर्ष का वनवास स्वीकार किया। यह यात्रा अयोध्या से शुरू होकर प्रयागराज, चित्रकूट, दंडकारण्य, पंचवटी और अंततः श्रीलंका तक जाती है, जो त्याग, धैर्य और कर्तव्य की मिसाल है। राम ने अयोध्या से लगभग 20 किमी दूर तमसा नदी के तट पर पहला विश्राम किया, जिसे ‘रामचौरा’ कहा जाता है। केवट द्वारा गंगा पार कराने के बाद, उन्होंने प्रयागराज भरद्वाज आश्रम  गए और उसके बाद चित्रकूट मे निवास किए। राम वन गमन पथ केवल भौगोलिक यात्रा नहीं है, बल्कि यह त्याग और धर्म की सर्वोच्च यात्रा है। वे केवट निषादराज और अन्य वनवासियों से मैत्री स्थापित कर उच्च आदर्श स्थापित किए। आपत्ति या विपत्ति काल से हमारे धैर्य धर्म मित्र आदि का पहचान हो आसानी से हो जाता है।
बालस्वामी जी द्वारा कथा के बीच बीच मे गाए जाने वाले भजन काफी प्रेरक होते हैं।  उन्होंने आयोजकों की सराहना करते हुए कहा कि उनके भागीरथ प्रयास से ही यहां लगातार पांचवी बार रामकथा का आयोजन संभव हो सका। रामकथा समिति के अध्यक्ष चन्दन जायसवाल ने कहा कि श्रद्धालुओं की उपस्थिति ही हम सबका मनोबल बढ़ाता है। साथ ही पूरे आठ दिनों तक भक्ति गंगा प्रवाहित करने के लिए बालस्वामी जी एवं उनके टीम के प्रति आभार जताया।

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chandeshraj1

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