0 0
Read Time:4 Minute, 11 Second


धूमधाम और हर्षोल्लास के साथ मना गढ़वा शहर का दुर्गा पूजा, नम आंखों से भक्तो ने दी मां को अंतिम विदाई,

गाड़ी घोड़े से नहीं बल्की श्रद्धालुओं के कंधो ने दिया मां को सहारा। उमड़ी भक्तो की भिड़, मां के जयकारों से भक्तिमय हुआ पुरा गढ़वा शहर।

आपको लेकर चलते हैं झारखंड के गढ़वा जिला स्थित गढ़देवी मन्दिर की ओर। जहां मन्दिर की घंटी बजते ही एक नई ऊर्जा का संचार होता है। यहां स्थापित होती है मां दूंगा की अनुपम प्रतीमा।

गढ़वा शहर में मनने वाला दुर्गा पुजा अदभुत और अनोखा रहा। नवरात्र के समय गढ़वा की गलियां मां की भक्तिमय गानों से गुंजमान रहता है। चारों तरफ मां के गीत संगीत सुनाई देती हैं। एकम से नवमी तक पुरे विधि विधान से मां दुर्गा की आराधना होती है और त्यौहार का आनंद उठाते हैं। यहां अष्ट धातु से निर्मित 11 फीट ऊंचाई की कलश स्थापना हुई थी। अष्टमी के दिन दीप दान का करने के परंपरा है। फिर दशमी के दिन मां की होती है मां की विदाई,

परंपरा के अनुसार समय आता है मां की विदाई का, यह एक ऐसा पल होता है जहां ख़ुशी के साथ भावुक भरा पल होता है हजारों की संख्या में विजयदशमी वाली दिन ढोल नगाड़े के साथ मां का जयकारा लगाते हुए दुर्गा मां को विसर्जन के लिए ले जाते हैं। यह इक ऐसा अदभुत पल है जो श्रद्धालुओं के लिए मां के प्रति आस्था और विश्वास को दर्शाता है। एक स्वर एक आवाज एक गढ़वा में तब्दील हो जाता है। सभी समुदाय और सभी वर्गो के लोग एक साथ मिलकर इस परंपरा को साकार बनाते हैं। पूरे गढ़वा वासी मां के विसर्जन में शामिल होते हैं। माताएं बहनें अपने छत के ऊपर से पुष्प वर्षा करती हैं। विसर्जन में इतनी भीड़ शायद ही अपने कहीं देखी होगी। विसर्जन में इतनी भीड का शमिल होना सचमुच में अद्भुत और अनोखा है। नम आंखों से मां का विसर्जन गढ़वा बस स्टैंड के नजदीक रामबाण तालाब में की जाती है।

आइए आपको लेकर चलते हैं गढ़ देवी मंदिर से जुड़ी कुछ रोचक तथ्यों की ओर जो इसे अलग पहचान देती है। कुछ साल पहले नवरात्री के समय इस मंदिर में भैंसों की बलि दी जाती थी और अभी हाल के दिनों में बकरा की बलि दी जाती है। इस बार यहां अष्ट धातु से निर्मित 11 फीट ऊंचाई की कलश स्थापना हुई थी। यहां 1914 से दुर्गा पूजा मनाने का सिलसिला शुरू हुआ जो आज तक किया जा रहा है। अष्टमी के दिन दीपदान की परंपरा चली आ रही है। विसर्जन के दिन श्रद्धालु अपने कंधे पर मां का विसर्जन करते हैं। कहा जाता है कि गढ़वा का जमींदार सह गढ़ का राजा अमर दयाल सिंह को पुत्र की प्राप्ति के लिए बंगाली पद्धति से दुर्गा पूजा आयोजन करने का सुझाव दिया गया था। तब से दुर्गा पूजा मनाने का सिलसिला शुरू हुआ।

धन्यवाद आप देख रहे हैं गढ़वा दृष्टि न्यूज़।
Thanks to #Studio PD Film’S
Rahul D’Souza Ji & Ravi Kr Das Ji
वीडियो और फ़ोटो उपलब्ध कराने के लिए। 9693314291
गढ़वा शहर से गढ़वा दृष्टी की टीम। नवनीत। हर्ष & अविनाश।



,

About Post Author

Admin Garhwa Drishti

Happy
Happy
0 %
Sad
Sad
0 %
Excited
Excited
0 %
Sleepy
Sleepy
0 %
Angry
Angry
0 %
Surprise
Surprise
0 %

Average Rating

5 Star
0%
4 Star
0%
3 Star
0%
2 Star
0%
1 Star
0%

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *