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*“अनूठे भक्त रूपी भगवान की महिमा”*

अंजनीपुत्र रामदूत हनुमान की महिमा ही अपरंपार है। भक्त श्रेष्ठ के गुणों को आत्मसात करने वाला व्यक्ति जीवन में सबकुछ साध्य कर सकता है। गोस्वामी तुलसीदास ने उन्हें सकलगुण निधान की संज्ञा देकर उनकी स्तुति की है। यदि हम उनके मात्र कुछ गुणों पर ही मनन और चिंतन करें तो जीवन जीना सीख जाएंगे।

1. *वीरता के अद्वितीय प्रतीक:* राम दूत हनुमान की वीरता और साहस की कीर्ति चहुं ओर व्याप्त है कि किस प्रकार से उन्होने सौ योजन वाला समुद्र एक ही छलांग में लाँघकर समस्त मुश्किलों का अपनी सूझ-बुझ का उपयोग कर अंत किया और लंका पहुँचकर माता सीता को प्रभु के आने का विश्वास दिलाया।

2. *स्थिति अनुरूप कुशल निर्णय की क्षमता:* लंका पार करते समय जब उनका सामना सुरसा नामक राक्षसी से हुआ और सुरसा निरंतर अपना मुँह का आकार हनुमानजी के आकार के अनुपात में बढ़ा रही थी तब उन्होने समय व्यर्थ किए बिना अपना सूक्ष्म रूप बनाया और उनके मुँह में जाकर वापस आ गए और पुनः अपने लक्ष्य की ओर अग्रसर हुए, इसीलिए उन्हें बल-बुद्धि देने वाला गया है।

3. *स्वामी श्रीराम के प्रति अनन्य प्रेम:* जब माता सीता ने उन्हें बताया की प्रभु श्रीराम को सिंदूर अत्यंत प्रिय है तो भक्त शिरोमणि ने अपने पूरे शरीर को ही सिंदूर से रंग दिया। श्रीराम के प्रति उनके प्रेम की कोई सीमा नहीं है। सत्य भी है प्रेम ही जीवन में शाश्वत है। इस अनन्य प्रेम ने ही उन्हें भक्त से भगवान बना दिया। वे तो अपने जीवन की सार्थकता राम भक्त होने में ही समझते है।

4. *अहं और लोभ का पूर्णतया त्याग:* हनुमान जी को अपनी शक्ति का कोई भी अभिमान नहीं है, वे तो प्रभु राम के सेवक बनकर ही प्रसन्न है। हर असंभव कार्य को परिणाम में परिवर्तित करने वाले रुद्रअवतार हनुमान जी अपनी सफलता का श्रेय प्रभु श्रीराम को देते है। उन्हें पद, वर्चस्व और नाम कुछ भी नहीं चाहिए सिर्फ प्रभु श्रीराम के कार्य को वे त्वरित कैसे कर दे वह इसी बात पर ध्यान देते है।

5. *कुशल प्रबंधन एवं नेतृत्व के परिचायक:* श्रीराम के पास युद्ध के समय कोई विशेष सेना नहीं थी, पर हनुमान जी ने पूरी कार्य कुशलता से वानर सेना से अपेक्षित कार्य करवाया एवं कुशलता से सबका नेतृत्व किया और मनोवांछित विजय भी प्राप्त की। सीमित संसाधनों में भी कुशलता से कार्य कराना रामभक्त की अनूठी पहचान है।

6. *कार्य के क्रियान्वयन को प्राथमिकता:* जब प्रभु श्रीराम लक्ष्मण जी के मूर्छित होने पर व्याकुल थे तब हनुमान जी ने प्रभु को विश्वास दिलाया की वे निश्चित समय पर संजीवनी बूटी लेकर उपस्थित हो जाएंगे। उनका ध्येय संजीवनी बूटी को सही समय तक लाना था। जब वहाँ पहुँचकर उन्हें संजीवनी बूटी की पहचान को लेकर संशय हुआ तो वे पूरा पर्वत लेकर ही पहुँच गए, पर कार्य की सफलता को सुनिश्चित किया। उनमें असीमित निर्णय क्षमता का प्रभावी गुण है।

7. *अनोखें जिज्ञासु:* जीवन में कुछ नवीन श्रेष्ठ करने के लिए जिज्ञासु होना अत्यंत जरूरी है। वे बचपन में सूर्य भगवान को लाल फल समझकर निगल गए। किसी भी नई चीज को देखकर यदि आपके मन में जिज्ञासा का भाव उत्पन्न होता है तो आप कुछ नवीन और बेहतर जान सकेंगे। इसलिए उन्नति के सोपान को तय करते समय जिज्ञासा को नजरंदाज न करें।

8. *धर्म के अनुरूप निर्णय लेना:* हनुमान जी चाहते तो स्वयं भी माता सीता को अपने साथ ला सकते थे, पर उन्होने अपनी पुंछ से लंका को जलाकर अपने स्वामी की शक्ति का परिचय दिया। उन्होने यह संदेश दिया की हम धर्म की लड़ाई लड़ेंगे। ऐसे चुपके से ले जाना कायरता की निशानी है।

9. *राम नाम की महिमा का ज्ञान:* कहते है कलयुग में मात्र भगवान के नाम जप से ही हमें मोक्ष प्राप्त हो सकता है तो फिर राम नाम की महिमा ही अपरंपार है। वाणी को शुद्धता देने वाला नाम है राम। जीवन को अर्थ देने वाला नाम है राम। संघर्ष से जूझकर ही केवल अपने लक्ष्य पर केन्द्रित रहने का नाम है राम। मानव जीवन के संघर्ष का मार्मिक चित्रण है राम और मानव जीवन की मुक्ति का द्वारा है राम। इसी राम नाम को हनुमान जी सदा स्मरण करते रहते है।

*डॉ. रीना रवि मालपानी (कवयित्री एवं लेखिका)*

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Admin Garhwa Drishti

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